सीकर: पंचायत एवं नगरीय निकाय चुनाव की तैयारियों के बीच अब सबसे ज्यादा निगाहें आरक्षण की लॉटरी पर टिक गई हैं। वार्डों के आरक्षण का फैसला कई निवर्तमान पार्षदों और चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे स्थानीय नेताओं की सियासी राह तय करेगा। सामान्य वार्ड आरक्षित होने पर कई दावेदारों के चुनावी समीकरण बिगड़ सकते हैं, वहीं आरक्षण बदलने से नए चेहरों के लिए राजनीतिक मैदान खुल सकता है।
राज्य में ओबीसी गणना रिपोर्ट आने के बाद नगरीय निकाय एवं पंचायतीराज संस्थाओं के चुनाव का रास्ता साफ हुआ है। अब चुनाव कार्यक्रम की घोषणा का इंतजार है। नगरीय निकायों में महापौर, नगर परिषद सभापति और नगर पालिका अध्यक्ष के पदों का आरक्षण लॉटरी से तय होगा, जबकि वार्डों का आरक्षण भी चुनावी तस्वीर बदलने वाला होगा।
कांग्रेस के गढ़ में भाजपा की सेंध, जिला प्रमुख की कुर्सी पर नजर
सीकर को लंबे समय से कांग्रेस का राजनीतिक गढ़ माना जाता रहा है, लेकिन पिछले कुछ चुनावों में भाजपा ने यहां सेंध लगाकर मुकाबले को दिलचस्प बना दिया है। जिला प्रमुख के चुनाव में क्रॉस वोटिंग और गुटीय समीकरण कई बार निर्णायक साबित हुए हैं। बहुमत के बावजूद कांग्रेस को जिला प्रमुख का पद गंवाना पड़ा है।
अब पंचायत चुनाव में दोनों दल एक बार फिर पूरी ताकत के साथ मैदान में उतरने की तैयारी में हैं। भाजपा जहां अपने प्रभाव को बनाए रखने की कोशिश करेगी, वहीं कांग्रेस पिछले चुनावों की स्थिति को पलटकर जिला प्रमुख की कुर्सी वापस हासिल करने की रणनीति पर काम करेगी।
नई ओबीसी आरक्षण रिपोर्ट के बाद जिला परिषद और पंचायत समितियों के वार्डों तथा सीटों के समीकरण बदलने की संभावना है। ऐसे में जिला प्रमुख और प्रधान पदों के लिए जातीय गणित, गुटबाजी, स्थानीय नेताओं की पकड़ और क्रॉस वोटिंग महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि सीकर जिला प्रमुख का चुनाव जीतने वाले दल को आगामी विधानसभा चुनाव के लिहाज से भी मनोवैज्ञानिक बढ़त मिल सकती है। यही वजह है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए यह चुनाव महज स्थानीय सत्ता का नहीं, बल्कि आगामी सियासी ताकत के प्रदर्शन का भी मुकाबला बन गया है।
सीकर जिले में कांग्रेस की संगठनात्मक स्थिति भी चुनावी गणित को प्रभावित कर सकती है। सीकर और नीमकाथाना क्षेत्र के लिए अलग-अलग जिला कांग्रेस कमेटियां हैं, जबकि जिला प्रमुख का पद एक ही है। ऐसे में दोनों क्षेत्रों के नेताओं के बीच बेहतर तालमेल और एकजुटता कांग्रेस के लिए अहम होगी।
श्रीमाधोपुर, नीमकाथाना और खंडेला जैसे क्षेत्रों में पार्टी की रणनीति और स्थानीय नेताओं के बीच तालमेल का असर जिला परिषद के चुनाव परिणामों पर पड़ सकता है।
जिला प्रमुख की सीट बनी प्रतिष्ठा का सवाल
सीकर में जिला प्रमुख की कुर्सी इस बार भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बन गई है। भाजपा पिछले वर्षों से चले आ रहे अपने प्रभाव को कायम रखना चाहती है, जबकि कांग्रेस बहुमत के बावजूद लगातार दो बार जिला प्रमुख का चुनाव हारने के बाद इस बार अपनी खोई राजनीतिक प्रतिष्ठा वापस पाने की कोशिश में है।
ऐसे में आरक्षण की लॉटरी से लेकर चुनाव परिणाम तक हर पड़ाव पर सियासी समीकरण बदलने की संभावना है। फिलहाल दोनों प्रमुख दलों की नजरें आरक्षण की घोषणा और चुनाव कार्यक्रम पर टिकी हैं।