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राजस्थान की जनता सत्ता और विपक्ष के प्रभावहीन होने से दुखी



▪︎ बाल मुकुंद जोशी

राजस्थान की राजनीति इन दिनों एक ऐसे दौर से गुजर रही है, जहां सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही जनता की अपेक्षाओं पर खरे उतरते दिखाई नहीं दे रहे हैं. प्रदेश में भाजपा सरकार के शासन को लेकर आमजन के बीच असंतोष की भावना लगातार बढ़ती हुई नजर आ रही है. महंगाई, बेरोजगारी, कानून-व्यवस्था, प्रशासनिक सुस्ती और जनसमस्याओं के समाधान में देरी जैसे मुद्दों ने सरकार की कार्यशैली पर सवाल खड़े किए हैं. यही कारण है कि प्रदेश का एक बड़ा वर्ग स्वयं को उपेक्षित और ठगा हुआ महसूस कर रहा है. केवल आम जनता ही नहीं, बल्कि भाजपा के समर्पित कार्यकर्ताओं में भी निराशा और बेचैनी का माहौल देखने को मिल रहा है, जिन्हें अपेक्षा थी कि सत्ता में आने के बाद संगठन और सरकार मिलकर बेहतर परिणाम देंगे.

दूसरी ओर, इस माहौल को देखकर कांग्रेस खेमे में उत्साह जरूर दिखाई देता है. दिल्ली से लेकर जयपुर तक कांग्रेस के कई नेता भाजपा सरकार की कमजोरियों को अपनी राजनीतिक उपलब्धि मानकर एक-दूसरे की पीठ थपथपाने में व्यस्त हैं. लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि केवल सत्ता पक्ष की विफलता विपक्ष की सफलता का प्रमाण नहीं होती। यदि भाजपा बेहतर और प्रभावी शासन देने में अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर पा रही है, तो कांग्रेस भी एक मजबूत, सक्रिय और जनहितैषी विपक्ष की भूमिका निभाने में सफल नहीं दिख रही.

कांग्रेस संगठन के भीतर भी गुटबाजी, नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा और अंदरूनी खींचतान की चर्चाएं लगातार सामने आती रहती हैं। कई बार ऐसा प्रतीत होता है कि जनता के मुद्दों पर संघर्ष करने की बजाय नेताओं का अधिक ध्यान आपसी शक्ति प्रदर्शन और राजनीतिक समीकरण साधने पर केंद्रित है. परिणामस्वरूप विपक्ष की वह धार दिखाई नहीं देती, जिसकी लोकतंत्र में अपेक्षा की जाती है.

ऐसे राजनीतिक परिदृश्य में सबसे अधिक निराशा जनता के हिस्से आती है. सत्ता बदलती है, चेहरे बदलते हैं, लेकिन आम आदमी की समस्याएं जस की तस बनी रहती हैं. जनता के बीच यह धारणा मजबूत होती जा रही है कि प्रदेश की राजनीति दो प्रमुख दलों के बीच सत्ता परिवर्तन तक सीमित होकर रह गई है, जबकि जनहित और सुशासन के मुद्दे पीछे छूटते जा रहे हैं.

कुल मिलाकर, राजस्थान की वर्तमान राजनीति को देखकर आमजन के मन में यही भावना उभर रही है कि उसे विकल्पों के नाम पर कभी "नागनाथ" तो कभी "सांपनाथ" के शासन का अनुभव करना पड़ रहा है.जब तक सत्ता पक्ष जवाबदेह शासन और विपक्ष प्रभावी निगरानी की भूमिका नहीं निभाएगा, तब तक लोकतंत्र का वास्तविक लाभ जनता तक पहुंचना कठिन ही रहेगा.