भारतीय राजनीति में राजेश पायलट का नाम एक लोकप्रिय जननेता और जमीनी राजनेता के रूप में याद किया जाता है. हालांकि बहुत कम लोग जानते हैं कि उनका मूल नाम राजेश्वर प्रसाद बिधूड़ी था और राजनीति में प्रवेश के दौरान उनका नाम बदलकर राजेश पायलट रखने के पीछे कांग्रेस नेता संजय गांधी की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी.
राजेश्वर प्रसाद बिधूड़ी का जन्म वर्ष 1945 में उत्तर प्रदेश के वेदपुरा गांव में हुआ था. वर्ष 1966 में उनका चयन भारतीय वायुसेना में हुआ और उन्होंने एक सफल सैन्य अधिकारी के रूप में अपनी पहचान बनाई. बाद में 1974 में उनका विवाह रमा पायलट से हुआ.
राजनीति में उनकी एंट्री उस समय हुई जब संजय गांधी ने उन्हें सक्रिय राजनीति में आने के लिए प्रेरित किया. नवंबर 1979 में उन्होंने वायुसेना की नौकरी से इस्तीफा देकर कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर ली. हालांकि कांग्रेस की ओर से लोकसभा चुनाव के लिए जारी पहली सूची में उनका नाम शामिल नहीं होने से वे निराश हो गए थे.
इसी दौरान एक दिलचस्प घटनाक्रम सामने आया. चुनाव प्रचार के सिलसिले में दिल्ली एयरपोर्ट पहुंचीं तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की मुलाकात राजेश और रमा पायलट से हुई. बताया जाता है कि इंदिरा गांधी ने रमा पायलट को अपने कार्यालय आने के लिए कहा. बाद में जब रमा गांधी से मिलने पहुंचीं और उन्होंने अपना परिचय “राजेश की पत्नी” के रूप में दिया, तो इंदिरा गांधी ने विशेष रुचि दिखाई.
कुछ समय बाद संजय गांधी का फोन राजेश पायलट के घर पहुंचा और उन्हें तत्काल मिलने के लिए बुलाया गया. अगले दिन मुलाकात के दौरान संजय गांधी ने उन्हें एक लिफाफा सौंपते हुए बताया कि उन्हें उत्तर प्रदेश नहीं, बल्कि राजस्थान की भरतपुर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ना है.
इसी मुलाकात में संजय गांधी ने एक और महत्वपूर्ण सुझाव दिया. उन्होंने कहा कि भरतपुर और आसपास के क्षेत्रों में लोग उन्हें वायुसेना के पायलट के रूप में जानते हैं, इसलिए राजनीति में उनकी पहचान भी उसी नाम से होनी चाहिए. इसके बाद राजेश्वर प्रसाद बिधूड़ी ने विधिवत हलफनामा देकर अपना नाम बदलकर राजेश पायलट रख लिया.
यहीं से भारतीय राजनीति में एक ऐसे नेता का उदय हुआ, जिसने राजस्थान ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी अपनी अलग पहचान बनाई. बाद के वर्षों में राजेश पायलट कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में शामिल हुए और किसानों, युवाओं तथा ग्रामीण भारत की आवाज़ के रूप में जाने गए.