स्वर्गीय रामेश्वर डूडी के समर्थकों और गोविंद राम मेघवाल के खेमों के बीच सड़क पर जो “लोकतांत्रिक कुश्ती” हुई, उसने यह साफ कर दिया कि पार्टी के अंदर संवाद कम और दंगल ज्यादा बचा है. हाल यह रहा कि प्रदेश कांग्रेस के कथित निर्देश भी दोनों पक्षों के जोश के आगे ऐसे उड़ गए जैसे आंधी में पोस्टर.
राजस्थान में सत्ता गंवाने के बाद उम्मीद थी कि कांग्रेस आत्ममंथन करेगी, लेकिन यहां तो “आत्ममंथन” की जगह “आंतरिक मंथन युद्ध” चल रहा है. विपक्ष में बैठकर सरकार को घेरने की बजाय, नेता अपने-अपने सामाजिक समीकरणों की गिनती में उलझे हुए हैं—मानो चुनाव नहीं, जातीय जनगणना की प्रैक्टिस चल रही हो.
मेघवाल बनाम जाट खेमेबाजी अब सिर्फ संगठन की दीवारों तक सीमित नहीं रही, बल्कि सड़कों पर उतरकर यह संदेश दे रही है कि 2028 का सत्ता सपना फिलहाल “अपनों के संघर्ष” में ही फंसा हुआ है. अगर यही हाल रहा, तो कांग्रेस को विपक्ष में बैठकर सरकार को घेरने की जरूरत नहीं पड़ेगी—पार्टी के अपने ही लोग “हाथ” की पकड़ ढीली करने के लिए काफी हैं.
कुल मिलाकर, कांग्रेस की मौजूदा स्थिति कुछ यूं है—नारा भले “एकता” का हो, लेकिन जमीन पर हर कोई अपनी-अपनी “राजनीतिक जाति” का झंडा लेकर मैदान में उतर चुका है.