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सीकर ने खोया अपना कोहिनूर: प्रहलाद झूरिया नहीं रहे


सीकर शहर ने आज एक ऐसा नाम खो दिया, जिसकी कमी लंबे समय तक महसूस की जाएगी. प्रहलाद झूरिया केवल एक व्यक्ति नहीं थे, बल्कि एक व्यक्तित्व थे जिससे जो भी एक बार मिला, वह हमेशा के लिए उनका हो गया.

आज सुबह जब उनके निधन की खबर सामने आई, तो पूरे शहर में शोक की लहर दौड़ गई. पहले तो लोगों को इस खबर पर यकीन ही नहीं हुआ, लेकिन मृत्यु तो अटल सत्य है और इस सच्चाई ने सभी को गहरे सदमे में डाल दिया.

नागौर जिले के छोटे से गांव मीठड़ी में 18 अगस्त 1947 को जन्मे झूरिया जी ने 1960 के दशक में सीकर आकर अपने कर्म, व्यवहार और सरलता से एक अलग पहचान बनाई. पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट रहे झूरिया जी की सलाह को शहर के बड़े-बड़े व्यापारी महत्व देते थे. उनकी ईमानदारी और सूझबूझ के कारण कई प्रतिष्ठित संस्थान उनसे जुड़े रहे.

व्यवसायिक जीवन के साथ-साथ उन्होंने सामाजिक और खेल गतिविधियों में भी सक्रिय भूमिका निभाई. विशेष रूप से बैडमिंटन संघ से जुड़कर उन्होंने खेल के विकास में उल्लेखनीय योगदान दिया.

राजनीतिक रूप से वे Indian National Congress से जुड़े रहे और महात्मा गांधी व जवाहरलाल नेहरू की विचारधारा से गहराई से प्रभावित थे. 1973 में कांग्रेस के सक्रिय सदस्य बने झूरिया ने श्रीमती इंदिरा गांधी के समर्थन में जेल यात्रा भी की. उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं. जिला युवक कांग्रेस के उपाध्यक्ष (1980-81), जिला कांग्रेस सेवा दल के मुख्य संगठक (1984-90), सीकर शहर कांग्रेसअध्यक्ष (1990-95), और जिला कांग्रेस के मुख्य महासचिव (1993-2002) सहित 2004-05 में कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में भी सेवाएं दीं.

हालांकि वे कांग्रेस के वरिष्ठ नेता थे, लेकिन उनकी पहचान एक सरल, मिलनसार और सभी के प्रिय इंसान के रूप में थी। वे दलगत राजनीति से ऊपर उठकर हर वर्ग और हर विचारधारा के लोगों में समान रूप से लोकप्रिय रहे.

उनका यूं अचानक, बिना कुछ कहे, खामोशी से चले जाना हर उस व्यक्ति को अखर रहा है, जिनसे उनका कोई न कोई रिश्ता था.चाहे वह व्यक्तिगत हो या सामाजिक.
प्रहलाद झूरिया जी का जीवन सेवा, सादगी और समर्पण का प्रतीक था.

झूरिया साहब को भावभीनी श्रद्धांजलि.🌹

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