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जब जुबान लग गई… और राजनीति ने करवट बदली


"राजनीति में अक्सर वादे किए जाते हैं, लेकिन भविष्यवाणियां कम ही सच होती हैं. मगर सीकर लोकसभा के चुनावी समर में जो हुआ, उसने सबको हैरान कर दिया था. यह सिर्फ एक जीत या हार नहीं है, बल्कि एक उभरते राजनेता की  'पॉलिटिकल डिकोडिंग' की जीत थी.

यह प्रसंग 12 वीं लोकसभा के चुनाव नतीजों के बाद का है. सीकर संसदीय सीट से पहली बार सांसद निर्वाचित होकर संसद पहुंचे सुभाष महरिया की मुलाकात कांग्रेस के दिग्गज नेता और पूर्व लोकसभा अध्यक्ष डॉ. बलराम जाखड़ से हुई. उस समय डॉ.जाखड़ बीकानेर से सांसद चुने गए थे.

मुलाकात के दौरान महरिया ने डॉ. जाखड़ के पैर छूकर आशीर्वाद लिया. इस पर डॉ. जाखड़ ने सहज भाव से कहा— “सुभाष, तुम एमपी बन गया।”
महरिया ने विनम्रता से उत्तर दिया “आपका आशीर्वाद है.”

इस पर डॉ. जाखड़ ने मुस्कराते हुए कहा— “नहीं सुभाष, अगर मैं सीकर से चुनाव लड़ता तो तुम संसद नहीं पहुंचते.”
जवाब में महरिया भी पीछे नहीं रहे. उन्होंने कहा— “भगवान करे, आने वाला चुनाव हम दोनों ही लड़ें.”

वक्त का पहिया घूमा और वर्ष 1999 में मध्यावधि चुनाव हुए. संयोग से उसी सीकर संसदीय सीट पर सुभाष महरिया और डॉ. बलराम जाखड़ आमने-सामने थे. चुनाव परिणामों में महरिया ने जीत दर्ज की और डॉ. जाखड़ को करारी हार का सामना करना पड़ा.

इसके बाद अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में मंत्री पद की शपथ लेने के बाद सुभाष महरिया सीधे अपने आवास न जाकर डॉ. जाखड़ के आवास पहुंचे और उनके पैर छूकर अभिवादन किया.

यह किस्सा राजनीतिक गलियारों में कभी आम चर्चा का विषय नहीं बना. आज सुभाष महरिया के जन्मदिन के अवसर पर जब उनसे फोन पर बातचीत के दौरान उनके राजनीतिक जीवन के कुछ स्मरणीय प्रसंगों के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने स्वयं इस घटना का उल्लेख किया—जो राजनीति में सम्मान, संवाद और समय की विडंबनाओं का प्रतीक बनकर सामने आया.