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पंचायत चुनाव में बेनीवाल परिवार का सियासी चक्रव्यूह

■ बाल मुकुंद जोशी

राजस्थान में पंचायत चुनाव के दौरान परिवारवाद का मुद्दा एक बार फिर सियासत के केंद्र में है. टिकट वितरण की खींचतान के बीच कई जगहों पर कर्मठ कार्यकर्ताओं की अनदेखी के आरोप लग रहे हैं.वहीं, एक ऐसा राजनीतिक परिवार भी है, जिसने चुनावी मैदान में पूरी ताकत झोंककर कार्यकर्ताओं की फौज खड़ी करने और अपना राजनीतिक आधार मजबूत करने की कवायद तेज कर दी है. यह परिवार है राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (आरएलपी) के प्रमुख हनुमान बेनीवाल का.

हनुमान बेनीवाल, उनकी पत्नी कनिका बेनीवाल और भाई नारायण बेनीवाल की सक्रियता बाड़मेर, बीकानेर और नागौर जिलों में चर्चा का विषय बनी हुई है. पंचायत चुनाव को लेकर बेनीवाल परिवार की लगातार सक्रियता के बीच आरएलपी कांग्रेस और भाजपा के सामने अपनी राजनीतिक मौजूदगी मजबूत करने की कोशिश कर रही है.

सियासी नजरिए से देखें तो बेनीवाल परिवार पंचायत चुनाव को केवल स्थानीय निकायों तक सीमित मुकाबले के रूप में नहीं, बल्कि आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों के लिहाज से भी अहम मानकर चल रहा है. यही वजह है कि चुनावी मोर्चे पर संगठन को सक्रिय करने, कार्यकर्ताओं को जोड़ने और स्थानीय स्तर पर नए चेहरों को आगे लाने पर जोर दिया जा रहा है.

सियासी जानकारों के बीच यह चर्चा भी है कि पंचायत चुनाव में बेनीवाल परिवार की सक्रियता से आरएलपी को नए स्थानीय नेतृत्व को उभारने का अवसर मिल सकता है. इसके साथ ही उन नेताओं की राजनीतिक जमीन भी परखी जाएगी, जिनका प्रभाव लंबे समय से सीमित क्षेत्रों तक सिमटा हुआ है. हालांकि, इन प्रयासों का वास्तविक असर चुनाव परिणामों के बाद ही स्पष्ट होगा.

फिलहाल, पंचायत चुनाव ने राजस्थान की सियासत में एक नई बहस को हवा दे दी है. एक तरफ परिवारवाद को लेकर सवाल हैं, तो दूसरी तरफ परिवार के नेतृत्व में संगठन और कार्यकर्ताओं को मजबूत करने की कोशिशें. ऐसे में बाड़मेर, बीकानेर और नागौर के चुनावी नतीजे आरएलपी की सांगठनिक ताकत और कांग्रेस-भाजपा के सामने उसकी चुनौती का आकलन करने के लिहाज से अहम रहेंगे.