■ बाल मुकुंद जोशी
सीकर नगर परिषद के सभापति पद की तस्वीर फिलहाल कांग्रेस की खतीजा बानो और भाजपा की कंचन खड़ोलिया के बीच सीधी दिखाई दे रही है.आंकड़ों की भाषा में कांग्रेस के पास 38 पार्षदों का स्पष्ट बहुमत है, जबकि भाजपा के खाते में 22 सीटें हैं. कांग्रेस के पार्षद बाड़ेबंदी में हैं और 21 सितंबर को होने वाले मतदान पर सबकी निगाहें टिकी हैं.
कागज पर देखें तो कांग्रेस के लिए मामला जितना आसान दिखाई देता है, सियासी गलियारों में उतनी ही ज्यादा फुसफुसाहट सुनाई दे रही है. बहुमत सुरक्षित है, पार्षद सुरक्षित हैं और बाड़ेबंदी भी मजबूत बताई जा रही है. ऐसे में सवाल सिर्फ इतना है कि क्या यह सियासी किला मतदान तक उतना ही मजबूत रहेगा?
शहर की राजनीतिक गपशप में भाजपा की ओर से कथित ‘धनवर्षा’ और कांग्रेस के पार्षदों के एक वर्ग में असंतोष की चर्चाएं भी तैर रही हैं. हालांकि इन चर्चाओं की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन निकाय चुनावों में अंतिम क्षणों तक चलने वाली जोड़-तोड़ की राजनीति से इनकार भी नहीं किया जा सकता. आखिर नगर परिषद की राजनीति में कब कौन-सा पत्ता फेंट दिया जाए, यह बताना मुश्किल होता है.
उधर, खतीजा बानो के लिए मुकाबले में एक दिलचस्प राजनीतिक संयोग भी चर्चा का विषय है. पिछली बार उन्हें माली समाज से आने वाली राजेश्वरी सैनी के हाथों हार का सामना करना पड़ा था और इस बार सामने भाजपा की कंचन खड़ोलिया हैं. यानी मुकाबला फिर एक महिला बनाम महिला है और सामाजिक समीकरणों की चर्चा ने भी राजनीतिक चाय की प्याली में उबाल ला दिया है.
वैसे कांग्रेस के पास संख्या बल इतना है कि सामान्य गणित में भाजपा के लिए राह आसान नहीं दिखती. लेकिन स्थानीय निकाय की राजनीति में गणित के साथ ‘मन’ और ‘मत’ का हिसाब भी चलता है. यही वजह है कि कांग्रेस अपने पार्षदों को एकजुट रखने में कोई कसर नहीं छोड़ी है और भाजपा भी हर संभावित राजनीतिक संभावना को तलाशती दिखाई दे रही है.
अब देखना दिलचस्प होगा कि 21 सितंबर को मतदान के दिन बाड़ेबंदी का ताला कांग्रेस के बहुमत को सुरक्षित रखता है या सीकर की सियासत में कोई ऐसा गुल खिलता है जिसकी गूंज दूर तक जायेगी.
फिलहाल तो कांग्रेस के खेमे में निश्चिंतता होनी चाहिए, लेकिन राजनीति है साहब... यहां ‘अल्लाह खैर करे’ कहकर भी कहानी खत्म नहीं होती!