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राज कोई भी हो अफसरशाही की मौज ही मौज


सीकर नगरपरिषद में हाल ही के महीनों में जो हाईवोल्टेज सियासी ड्रामा हुआ एक तरफ कलेक्टर मुकुल शर्मा और दूसरी ओर प्रभारी मंत्री संजय शर्मा. “क्लाइमैक्स” उसका आखिरकार आज आई तबादला सूची में देखने को मिल ही गया. ट्रांसफर तो हुआ, लेकिन अंदाज़ ऐसा कि साहब सीधे मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की छत्रछाया में जा विराजे. 

अब प्रभारी मंत्री जी को कौन समझाए कि अफसरशाही की मिट्टी कुछ अलग ही किस्म की होती है.सत्ता बदले, सरकार बदले, मगर इनकी चमक और जमावट पर खास फर्क नहीं पड़ता.
कल तक यही मुकुल शर्मा कांग्रेस शासन में रघु शर्मा की कृपा का आनंद ले रहे थे, और आज भाजपा राज में भी उसी ठाठ से स्थापित हैं. यानी सरकारें आती-जाती रहती हैं, मगर अफसर अपनी “स्थिरता” से ही व्यवस्था को समझाते रहते हैं.

राजनीति में असर अगर पड़ता है तो वह नेताओं पर मंत्री जी, कुर्सी की गर्मी और ठंडक का एहसास आपको ही ज्यादा होता है. खैर, मामला जब “शर्मा बंधुओं” की पंचायत का हो, तो फैसला भी कुछ यूं ही दिलचस्प होना था.

अब इस पूरे घटनाक्रम में असली “अप्रैल फूल” कौन बना—यह राज तो आप ही बेहतर जानते होंगे.