▪︎ बाल मुकुंद जोशी
राजस्थान में संभावित रूप से अप्रैल माह में होने वाले पंचायत चुनावों की आहट के साथ ही ग्रामीण अंचलों की राजनीति में गर्माहट तेज़ हो गई है. शेखावाटी अंचल के सीकर जिले में सियासी गतिविधियां खुलकर सामने आने लगी हैं. इसी कड़ी में हनुमान सेना द्वारा आयोजित कार्यकर्ता सम्मेलन ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आगामी पंचायत चुनाव केवल औपचारिक नहीं, बल्कि सीधा सियासी संघर्ष साबित होने वाले हैं.
इस बार के पंचायत चुनाव रोचक होने के साथ-साथ घमासान मचाने वाले माने जा रहे हैं. सीकर जिले में कांग्रेस, भाजपा और माकपा के अलावा राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (आरएलपी) भी पूरे दमखम के साथ मैदान में उतरने की तैयारी में है और अपना राजनीतिक वजूद मजबूत करने की जद्दोजहद में जुटी है.
पंचायतों के सीमांकन विस्तार और बदलाव को लेकर भाजपा पहले से ही खुद को “सेफ ज़ोन” में मानते हुए फील गुड की स्थिति में नजर आ रही है. वहीं कांग्रेस राज्य सरकार की कथित असफलताओं को मुद्दा बनाकर ग्रामीण सत्ता पर एक बार फिर “हाथ” का कब्जा जमाने को लेकर आशान्वित दिखाई दे रही है.
सीकर जिले के कुछ इलाकों में लाल सलाम यानी वामपंथी ताकतें भी अपनी खोई जमीन वापस पाने के लिए सक्रिय होंगी. सांसद का. अमराराम पर धोद, सीकर, दांतारामगढ़, खंडेला और लक्ष्मणगढ़ में फिर से संगठनात्मक ताकत का एहसास कराने की बड़ी जिम्मेदारी रहेगी.
इसी बीच आरएलपी भी इस बार सीकर जिले में पंचायत चुनाव को पूरी गंभीरता से लड़ने के मूड में है. पार्टी सुप्रीमो हनुमान बेनीवाल समय-समय पर इसके संकेत दे चुके हैं. ऐसे में जिले की ग्रामीण राजनीति का भूगोल बदलने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता.
पंचायत चुनाव में सियासी दलों केसाथ-साथ कई दिग्गज नेताओं की राजनीतिक प्रतिष्ठा भी दांव पर होगी. इनमें प्रमुख रूप से प्रदेश कांग्रेसाध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा, यूडीएच मंत्री झाबर सिंह खर्रा, पूर्व केंद्रीय मंत्री सुभाष महरिया और वरिष्ठ नेता महादेव सिंह खंडेला शामिल हैं.
चुनावी माहौल के दौरान सबसे अधिक उठापटक जाट नेताओं के बीच देखने को मिल सकती है. विशेषकर हनुमान सेना और गोविंद सिंह डोटासरा के बीच सियासी प्रहार और जवाबी हमलों से पंचायत चुनाव और अधिक दिलचस्प हो सकते हैं.
कुल मिलाकर, सीकर की पंचायत राजनीति पर यह मारवाड़ी कहावत पूरी तरह सटीक बैठती नजर आ रही है.
“जाटां जाटां ने मारे, बीचां मारे करतार।”