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वजूद की निर्णायक लड़ाई में जुटे हनुमान बेनीवाल

राजस्थान की सियासत वर्ष- 2028 के विधानसभा चुनाव की ओर बढ़ रही है, और इस बार यह मुकाबला हनुमान बेनीवाल के लिए किसी निर्णायक परीक्षा से कम नहीं दिखता.आरएलपी के प्रमुख के तौर पर यह चुनाव उनके राजनीतिक भविष्य की दिशा तय करने वाला माना जा रहा है—एक तरह से “करो या मरो” की स्थिति.

पिछले कुछ समय से बेनीवाल की सक्रियता यह संकेत देती है कि वे इस चुनौती को लेकर पूरी तरह गंभीर हैं. देश और प्रदेश में लगातार कार्यक्रमों,सभाओं और जनसंपर्क अभियानों के जरिए वे अपने समर्थकों के बीच यह संदेश देने से नहीं चूकते कि यह उनकी “आखिरी लड़ाई” है. वे अक्सर कहते हैं कि यदि इस बार जनता का भरोसा मिला तो वे सेवा जारी रखेंगे, अन्यथा अपने संघर्ष को विराम देने पर विचार करेंगे.

उनकी राजनीतिक शैली भी उन्हें अलग पहचान देती है. तीखे तेवर, स्पष्ट बयान और विरोधियों पर सीधे हमले—इन्हीं के बल पर वे लंबे समय से सुर्खियों में बने हुए हैं. हालांकि विरोधी इसे उनका ‘बड़बोलापन’ करार देते हैं, लेकिन समर्थकों के बीच यही अंदाज उनकी लोकप्रियता की वजह भी बनता है.

सीकर जिले के भारणी में कल यूडीएच मंत्री झाबर सिंह खर्रा की पुत्री के विवाह समारोह में देर रात उनकी मौजूदगी ने एक बार फिर यह साबित किया कि बेनीवाल की जन अपील में कमी नहीं आई है.रात दो बजे पहुंचे इस कार्यक्रम में समर्थकों का उत्साह अपने चरम पर था. यह उनके उस राजनीतिक व्यक्तित्व को भी दर्शाता है, जिसमें देर रात तक सक्रिय रहना अब सामान्य बात हो चुकी है.चाहे वह विवाह समारोह हो, आंदोलन का मंच या पार्टी की सभा.

नागौर की राजनीति से उभरकर प्रदेश स्तर पर अपनी पहचान बनाने वाले बेनीवाल की यात्रा भी कम दिलचस्प नहीं रही है. उन पर ‘जाटवाद’ को बढ़ावा देने के आरोप लगते रहे हैं, लेकिन बड़ी संख्या में भीड़ जुटाने और मुद्दों को आक्रामक ढंग से उठाने की उनकी क्षमता उन्हें अलग खड़ा करती है. पीड़ितों के पक्ष में खुलकर खड़े होने की उनकी शैली ने उन्हें जनाधार भी दिया है.

फिर भी चुनौतियां कम नहीं हैं. भाजपा और कांग्रेस के साथ गठबंधन कर वे संसद तक तो पहुंचे, लेकिन खींवसर में मिली हार ने उन्हें सियासत की कठोर वास्तविकता का एहसास कराया. अब आरएलपी को प्रासंगिक बनाए रखने के लिए नागौर और आसपास के क्षेत्रों में संगठन को मजबूत करना और जनसमर्थन को वोटों में बदलना उनके सामने बड़ी चुनौती है.

राजस्थान की मौजूदा राजनीति में जहां कांग्रेस और भाजपा अपनी-अपनी रणनीतियों में व्यस्त हैं, वहीं बेनीवाल की सक्रियता और बयानबाजी उन्हें चर्चा के केंद्र में बनाए हुए है.अब देखना यह होगा कि वर्ष 2028 का चुनाव उन्हें सत्ता के केंद्र तक पहुंचाता है या फिर वे सियासत के नेपथ्य में चले जाते हैं.