राजस्थान की राजनीति के स्वर्णिम अध्याय में हरिदेव जोशी का नाम अद्वितीय सम्मान के साथ दर्ज है. तीन बार प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे स्वर्गीय जोशी उन विरले जननेताओं में शामिल थे, जिन्हें अपने राजनीतिक जीवन में कभी चुनावी पराजय का सामना नहीं करना पड़ा. उन्होंने कुल 10 बार अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों से चुनाव लड़ा और हर बार मतदाताओं का अपार स्नेह एवं विश्वास प्राप्त किया.
उनकी विजय यात्रा का आरंभ वर्ष 1952 के प्रथम विधानसभा चुनाव से हुआ, जब वे डूंगरपुर सीट से निर्वाचित हुए. इसके पश्चात 1957 और 1962 के चुनावों में उन्होंने बांसवाड़ा जिले की घाटोल विधानसभा से जीत हासिल की. आगे चलकर लगातार सात चुनावों में बांसवाड़ा विधानसभा क्षेत्र से विजय प्राप्त कर उन्होंने एक ऐसा ऐतिहासिक कीर्तिमान स्थापित किया, जो आज भी अटूट है. वे राजस्थान के ऐसे पहले नेता बने, जिन्होंने लगातार 10 विधानसभा चुनाव जीतने का गौरव हासिल किया.
राजनीतिक संगठन और विचारधारा के क्षेत्र में भी उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा. वर्ष 1962 में वे कांग्रेस कमेटी के प्रदेशाध्यक्ष बने. साथ ही, वे कांग्रेस के प्रमुख प्रकाशन ‘कांग्रेस संदेश’ साप्ताहिक के प्रधान संपादक तथा ‘दैनिक नवयुग’ के प्रकाशक व संपादक के रूप में भी सक्रिय रहे. 2 जून 1965 को उन्हें मोहनलाल सुखाड़िया मंत्रिमंडल में कैबिनेट मंत्री के रूप में शामिल किया गया. 11 अक्टूबर 1973 को हरिदेव जोशी ने पहली बार राजस्थान के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. इससे पूर्व वे सुखाडिया और बरकतुल्लाह खान सरकार में उद्योग, खनिज सार्वजनिक निर्माण, परिवहन, सामुदायिक विकास, पंचायत, बिजली, सिंचाई, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य तथा जनसंपर्क में मंत्री पद की जिम्मेदारियां निभा चुके थे. इसके अतिरिक्त, वे दो बार विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता भी रहे.
जोशी को ‘बांगड का गांधी’ कहा जाना उनके जनसेवा कार्यों का प्रमाण है. उन्होंने मेवाड़ एवं बांगड़ क्षेत्र की नदियों के जल को माही नदी पर बांध निर्माण के माध्यम से बांसवाड़ा तक पहुंचाकर आदिवासी अंचल को विकास की नई धारा से जोड़ा. यह कार्य उनके दूरदर्शी नेतृत्व और जनकल्याणकारी सोच का प्रतीक है, जिसके कारण वे आदिवासियों के लिए ‘भगीरथ’ के रूप में सदैव स्मरणीय रहेंगे.
28 मार्च को उनकी पुण्यतिथि पर इस महान जननायक को शत-शत नमन.